मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् | कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च || ९||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
12 पदमच्चित्ता
मुझमें चित्त लगाने वाले
मद्गतप्राणा
मुझमें प्राण अर्पण करने वाले
बोधयन्तः
समझाते हुए
परस्परम्
परस्पर
कथयन्तः
कहते हुए
च
और
माम्
मुझे
नित्यम्
निरन्तर
तुष्यन्ति
संतुष्ट होते हैं
च
और
रमन्ति
रमण करते हैं
च
भी।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
मेरे भक्तजन मुझमें चित्त लगाकर और मुझमें प्राणों को अर्पण करके, परस्पर मुझे समझाते और निरन्तर मेरा कथन करते हुए संतुष्ट होते हैं और मुझमें ही रमण करते हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
Krishna describes the beautiful interactions of His devotees. They constantly think of Him, their lives are dedicated to Him, and they find joy in discussing His divine qualities with each other. This mutual enlightenment and shared devotion brings them supreme satisfaction and bliss.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान श्रीकृष्ण अपने भक्तों की विशेषताएँ बताते हैं: वे मुझमें चित्त लगाने वाले, मुझमें प्राण अर्पण करने वाले, परस्पर एक-दूसरे को समझाने वाले और निरन्तर मेरा कथन करने वाले होते हैं। इस प्रकार वे संतुष्ट रहते हैं और मुझमें ही रमण करते हैं।
The Lord portrays the ideal devotees who live and breathe for Him. They find immense joy in sharing their spiritual realizations with each other, and this constant remembrance and discussion of the Divine brings them eternal satisfaction and bliss.