मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु | नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु || १० ||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
7 पदअसक्ति
आसक्ति का अभाव
अनभिष्वङ्ग
अत्यधिक स्नेह का अभाव
पुत्रदारगृहादिषु
पुत्र, स्त्री, घर आदि में
नित्यम्
सदा
च
और
समचित्तत्वम्
समान चित्तता
इष्टानिष्टोपपत्तिषु
इष्ट और अनिष्ट की प्राप्ति में
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
पुत्र, स्त्री, घर आदि में आसक्ति का अभाव और अत्यधिक स्नेह का न होना, तथा इष्ट और अनिष्ट की प्राप्ति में निरन्तर समान चित्त रहना –
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
ये गुण ज्ञान की ओर ले जाते हैं – परिवार में ममता का त्याग और सुख-दुःख में समभाव। These virtues lead to knowledge – renouncing attachment to family and maintaining equanimity in pleasure and pain.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
पुत्र, स्त्री, घर आदि में आसक्ति न होना, और इष्ट-अनिष्ट की प्राप्ति में समान चित्त रहना – ये ज्ञान के लक्षण हैं।
Non-attachment to son, wife, home, etc., and constant equanimity in desirable and undesirable situations – these are marks of knowledge.
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
समभाव ही योग है। सुख-दुःख में समान रहना आत्मज्ञान की निशानी है।
Equanimity is yoga. Being equal in pleasure and pain is a sign of self-realization.