श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 13 (क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga))

अध्याय 13 · श्लोक 10

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 35 3 मिनट का पठन 110 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु | नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु || १० ||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

7 पद
असक्ति
आसक्ति का अभाव
अनभिष्वङ्ग
अत्यधिक स्नेह का अभाव
पुत्रदारगृहादिषु
पुत्र, स्त्री, घर आदि में
नित्यम्
सदा
च
और
समचित्तत्वम्
समान चित्तता
इष्टानिष्टोपपत्तिषु
इष्ट और अनिष्ट की प्राप्ति में

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

पुत्र, स्त्री, घर आदि में आसक्ति का अभाव और अत्यधिक स्नेह का न होना, तथा इष्ट और अनिष्ट की प्राप्ति में निरन्तर समान चित्त रहना –

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

ये गुण ज्ञान की ओर ले जाते हैं – परिवार में ममता का त्याग और सुख-दुःख में समभाव। These virtues lead to knowledge – renouncing attachment to family and maintaining equanimity in pleasure and pain.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

पुत्र, स्त्री, घर आदि में आसक्ति न होना, और इष्ट-अनिष्ट की प्राप्ति में समान चित्त रहना – ये ज्ञान के लक्षण हैं।

Non-attachment to son, wife, home, etc., and constant equanimity in desirable and undesirable situations – these are marks of knowledge.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

समभाव ही योग है। सुख-दुःख में समान रहना आत्मज्ञान की निशानी है।

Equanimity is yoga. Being equal in pleasure and pain is a sign of self-realization.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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