मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी | विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि || ११ ||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
8 पदमयि
मुझमें
च
और
अनन्ययोगेन
अनन्य भक्तियोग से
भक्ति
भक्ति
अव्यभिचारिणी
अविचल
विविक्तदेशसेवित्वम्
एकान्त स्थान में रहने का भाव
अरति
अरुचि
जनसंसदि
लोगों की सभा में
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
तथा अनन्य योग द्वारा मुझमें अव्यभिचारिणी भक्ति, एकान्त स्थान में रहने का भाव और मनुष्यों की सभा में अरुचि –
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भक्ति, एकान्तवास और जनसमूह से विरक्ति – ये ज्ञान के लक्षण हैं। Devotion, solitude, and distaste for crowds are also marks of knowledge.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
मुझमें अनन्य भक्ति, एकान्त स्थान में रहने की प्रवृत्ति, और लोगों की भीड़ से अरुचि – ये भी ज्ञान के लक्षण हैं।
Unswerving devotion to Me, resorting to solitary places, and distaste for crowds – these are also marks of knowledge.
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भक्ति और एकान्त साधना के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान करते हैं।
Devotion and solitude provide a conducive environment for spiritual practice.