श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 13 (क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga))

अध्याय 13 · श्लोक 9

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 35 3 मिनट का पठन 122 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च | जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् || ९ ||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

6 पद
इन्द्रियार्थेषु
इन्द्रियों के विषयों में
वैराग्यम्
विरक्ति
अनहङ्कार
अहंकार का अभाव
एव
ही
च
और
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्
जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि और दुःख के दोषों का बार-बार दर्शन

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

इन्द्रियों के विषयों में वैराग्य, अहंकार का सर्वथा अभाव, तथा जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि और दुःख के दोषों का बार-बार दर्शन –

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

ये गुण ज्ञान के अग्रिम साधन हैं – विषयों से विरक्ति और संसार की अनित्यता का भान। These further virtues are detachment from sense objects and awareness of the evils of worldly existence.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

इन्द्रियों के विषयों में आसक्ति न रखना, अहंकार का न होना, तथा जन्म, मृत्यु, जरा, रोग और दुःख के दोषों का बार-बार चिन्तन करना – ये भी ज्ञान के लक्षण हैं।

Detachment from sense objects, absence of egoism, and constant reflection on the evils of birth, death, old age, sickness, and pain – these are also marks of knowledge.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

संसार की अनित्यता का बोध वैराग्य उत्पन्न करता है, जो ज्ञान का मार्ग है।

Awareness of the impermanence of the world generates detachment, which is the path to knowledge.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga)
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श्लोक 9/35 26% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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