श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 13 (क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga))

अध्याय 13 · श्लोक 13

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 35 3 मिनट का पठन 113 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते | अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते || १३ ||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

17 पद
ज्ञेयम्
ज्ञेय तत्व
यत्
जो
तत्
उसको
प्रवक्ष्यामि
अच्छी तरह कहूँगा
यत्
जिसको
ज्ञात्वा
जानकर
अमृतम्
अमृतत्व (मोक्ष)
अश्नुते
प्राप्त करता है
अनादिमत्
अनादि
परम्
परम
ब्रह्म
ब्रह्म
न
नहीं
सत्
सत्
तत्
वह
न
नहीं
असत्
असत्
उच्यते
कहा जाता है

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो ज्ञेय (तत्त्व) है, उसे मैं अच्छी तरह कहूँगा, जिसे जानकर मनुष्य अमृतत्व (मोक्ष) को प्राप्त हो जाता है। वह अनादि, परब्रह्म है, जो न सत् कहा जाता है और न असत्।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

अब भगवान ज्ञेय तत्व (परब्रह्म) का वर्णन करते हैं, जो अनादि, सत्-असत् से परे है। Now the Lord describes the object of knowledge – the Supreme Brahman, which is beginningless and transcends being and non-being.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

मैं उस ज्ञेय तत्व को बताऊँगा, जिसे जानकर मनुष्य अमृत (मोक्ष) पाता है। वह अनादि परब्रह्म है, जिसे न सत् कहा जाता है और न असत्।

I will declare that which is to be known, knowing which one attains immortality – the beginningless Supreme Brahman, which is called neither being nor non-being.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

परम सत्य शब्दों और विचारों से परे है, केवल अनुभव से जाना जा सकता है।

The Supreme Truth is beyond words and thoughts; it can only be realized through experience.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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