श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 13 (क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga))

अध्याय 13 · श्लोक 14

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 35 3 मिनट का पठन 106 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् | सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति || १४ ||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
सर्वतः
सब ओर
पाणिपादम्
हाथ और पैर
तत्
वह (ब्रह्म)
सर्वतः
सब ओर
अक्षिशिरोमुखम्
आँखें, सिर और मुख
सर्वतः
सब ओर
श्रुतिमत्
कान
लोके
संसार में
सर्वम्
सब कुछ
आवृत्य
व्याप्त करके
तिष्ठति
स्थित है

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

उस (परमात्मा) के हाथ-पैर सब ओर हैं, आँखें, सिर और मुख सब ओर हैं, कान सब ओर हैं, क्योंकि वह संसार में सब कुछ व्याप्त करके स्थित है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

यह श्लोक परमात्मा की सर्वव्यापकता का वर्णन करता है। वह सभी इन्द्रियों से युक्त होते हुए भी उनसे परे है। This verse describes the all-pervasiveness of the Supreme; He is endowed with all senses yet transcends them.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

उस परमात्मा के हाथ और पैर सब ओर हैं, आँखें, सिर और मुख सब ओर हैं, कान सब ओर हैं, क्योंकि वह संसार में सब कुछ व्याप्त करके स्थित है।

That Supreme Being has hands and feet everywhere, eyes, heads, and mouths everywhere, ears everywhere; He exists in the world, enveloping all.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

ईश्वर सर्वव्यापी है, वह हर जगह और हर कण में विद्यमान है।

God is omnipresent; He exists everywhere and in every particle.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga)
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श्लोक 14/35 40% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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