मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् | असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च || १५ ||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
9 पदसर्वेन्द्रियगुणाभासम्
सभी इन्द्रियों के गुणों को प्रकाशित करने वाला
सर्वेन्द्रियविवर्जितम्
सभी इन्द्रियों से रहित
असक्तम्
आसक्ति रहित
सर्वभृत्
सबका धारण-पोषण करने वाला
च
और
एव
ही
निर्गुणम्
गुणों से रहित
गुणभोक्तृ
गुणों का भोक्ता
च
और
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
वह सब इन्द्रियों के गुणों को प्रकाशित करने वाला है, परन्तु इन्द्रियों से रहित है, आसक्ति रहित है, फिर भी सबका धारण-पोषण करने वाला है, निर्गुण है, फिर भी गुणों का भोक्ता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यहाँ परमात्मा के विरोधाभासी स्वरूप का वर्णन है – वह इन्द्रियों से रहित होकर भी उनके द्वारा अनुभव किया जाता है। This describes the paradoxical nature of the Supreme – without senses yet perceived through them, unattached yet supporting all.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
वह सब इन्द्रियों के कार्यों को प्रकाशित करता है, किन्तु इन्द्रियों से रहित है; आसक्त न होकर सबका धारण-पोषण करता है; निर्गुण होकर भी गुणों का भोक्ता है।
He shines through the functions of all senses, yet is without senses; unattached, yet supports all; devoid of qualities, yet experiences them.
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
ईश्वर अद्वितीय है, वह एक ही साथ निर्गुण और सगुण है।
God is unique; He is simultaneously transcendent and immanent.