मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च | सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् || १६ ||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
16 पदबहि
बाहर
अन्त
भीतर
च
और
भूतानाम्
भूतों (प्राणियों) के
अचरम्
स्थिर
चरम्
चर
एव
ही
च
और
सूक्ष्मत्वात्
सूक्ष्म होने के कारण
तत्
वह
अविज्ञेयम्
न जाना जा सकता
दूरस्थम्
दूर स्थित
च
और
अन्तिके
समीप
च
भी
तत्
वह
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
वह सम्पूर्ण प्राणियों के बाहर-भीतर है, स्थिर भी है और चर भी है; सूक्ष्म होने के कारण वह अज्ञेय (इन्द्रियों से अगोचर) है, वह दूर भी है और पास भी है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
परमात्मा की सर्वव्यापकता और सूक्ष्मता का वर्णन। वह सबमें व्याप्त है, फिर भी दुर्जेय है। Description of the omnipresence and subtlety of the Supreme. He pervades all yet is incomprehensible.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
वह सब प्राणियों के बाहर और भीतर है, स्थिर और चर दोनों रूपों में है; सूक्ष्म होने के कारण अगोचर है; वह दूर भी है और पास भी।
He is outside and inside all beings, both moving and unmoving; due to subtlety, He is incomprehensible; He is far away, yet He is near.
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
ईश्वर सर्वत्र है, इसलिए वह सदा हमारे समीप है, बस उसे पहचानने की आवश्यकता है।
God is everywhere, so He is always near; we only need to recognize Him.