श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 13 (क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga))

अध्याय 13 · श्लोक 17

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 35 3 मिनट का पठन 104 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् | भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च || १७ ||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
अविभक्तम्
विभाग रहित
च
और
भूतेषु
भूतों में
विभक्तम्
विभक्त
इव
मानो
च
और
स्थितम्
स्थित
भूतभर्तृ
भूतों का पालन करने वाला
च
और
तत्
वह
ज्ञेयम्
ज्ञेय
ग्रसिष्णु
सबको ग्रास करने वाला
प्रभविष्णु
सबको उत्पन्न करने वाला
च
और

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

वह अविभक्त (अखण्ड) होते हुए भी भूतों में विभक्त (खण्डित) सा स्थित है; वह ज्ञेय (परमात्मा) भूतों का धारण-पोषण करने वाला, सबको ग्रास करने वाला और सबको उत्पन्न करने वाला है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

परमात्मा एक होते हुए भी अनेक रूपों में दिखता है। वही सृष्टि का पालन, संहार और सृजन करता है। The Supreme is one yet appears as many. He is the sustainer, devourer, and creator of all.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

वह अविभक्त (अखण्ड) है, फिर भी प्राणियों में विभक्त-सा स्थित है; वह ज्ञेय तत्व प्राणियों का पालन, संहार और सृजन करता है।

He is undivided, yet appears as divided among beings; He is to be known as the supporter, devourer, and creator of all beings.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

एक ही सत्य अनेक रूपों में व्यक्त हो रहा है। भेद केवल दृष्टि का है।

The one Truth manifests in many forms. The diversity is only in perception.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga)
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श्लोक 17/35 49% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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