श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 13 (क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga))

अध्याय 13 · श्लोक 18

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 35 3 मिनट का पठन 113 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते | ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् || १८ ||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
ज्योतिषाम्
ज्योतियों में
अपि
भी
तत्
वह
ज्योति
प्रकाश
तमस
अज्ञान से
परम्
परे
उच्यते
कहा जाता है
ज्ञानम्
ज्ञान
ज्ञेयम्
ज्ञेय
ज्ञानगम्यम्
ज्ञान से प्राप्त होने योग्य
हृदि
हृदय में
सर्वस्य
सबके
विष्ठितम्
स्थित

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

वह सब ज्योतियों की भी ज्योति है तथा अज्ञान से परे कहा गया है; वह ज्ञान है, ज्ञेय है और ज्ञान से प्राप्त होने योग्य है; वह सबके हृदय में स्थित है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

परमात्मा ही सबका आंतरिक प्रकाश है। वह ज्ञानस्वरूप है और हृदय में विराजमान है। The Supreme is the inner light of all. He is knowledge itself and resides in the hearts of all.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

वह सब प्रकाशों का प्रकाश है, अज्ञान से परे है; वह ज्ञान है, ज्ञेय है, और ज्ञान का लक्ष्य है; वह सबके हृदय में स्थित है।

He is the light of all lights, beyond ignorance; He is knowledge, the object of knowledge, and attainable by knowledge; He is seated in the hearts of all.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

परमात्मा हमारे हृदय में है, उसे जानने के लिए अंतर्मुखी होना होगा।

The Supreme is within our hearts; to know Him, we must turn inward.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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