मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि | विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् || २० ||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
15 पदप्रकृतिम्
प्रकृति
पुरुषम्
पुरुष
च
और
एव
ही
विद्धि
जानो
अनादी
अनादि
उभौ
दोनों
अपि
ही
विकारान्
विकारों को
च
और
गुणान्
गुणों को
च
और
एव
ही
विद्धि
जानो
प्रकृतिसम्भवान्
प्रकृति से उत्पन्न
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
प्रकृति और पुरुष – दोनों को ही अनादि जानो और विकारों तथा गुणों को भी प्रकृति से उत्पन्न ही जानो।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
प्रकृति (मूल प्रकृति) और पुरुष (आत्मा) दोनों अनादि हैं। समस्त विकार और गुण प्रकृति से उत्पन्न होते हैं। Prakriti (nature) and Purusha (spirit) are both beginningless. All modifications and qualities arise from Prakriti.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
प्रकृति और पुरुष दोनों ही अनादि हैं। और जितने भी विकार और गुण हैं, वे सब प्रकृति से उत्पन्न हैं – ऐसा जानो।
Know that Prakriti and Purusha are both beginningless; and know also that all modifications and qualities are born of Prakriti.
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
संसार के सभी विकार प्रकृति के हैं, आत्मा उनसे अलिप्त है।
All worldly modifications belong to Prakriti; the Self is untouched by them.