मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते | पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते || २१ ||
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
9 पदकार्यकारणकर्तृत्वे
कार्य-कारण के कर्तृत्व में
हेतु
कारण
प्रकृति
प्रकृति
उच्यते
कही जाती है
पुरुष
पुरुष
सुखदुःखानाम्
सुख-दुःखों के
भोक्तृत्वे
भोक्तापन में
हेतु
कारण
उच्यते
कहा जाता है
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
प्रकृति कार्य और करण (इन्द्रियों) के कर्तृत्व में हेतु (कारण) कही जाती है और पुरुष सुख-दुःखों के भोक्तृत्व में हेतु कहा जाता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
प्रकृति क्रियाओं का कर्ता है, जबकि पुरुष उन क्रियाओं के फल (सुख-दुःख) का भोक्ता है। Prakriti is the agent of actions, while Purusha is the experiencer of their results.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
प्रकृति कार्य और करण के कर्तृत्व में कारण कही जाती है, और पुरुष सुख-दुःख के भोक्तृत्व में कारण कहा जाता है।
Prakriti is said to be the cause of agency and instruments; Purusha is said to be the cause of the experience of pleasure and pain.
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
शरीर और इन्द्रियाँ प्रकृति के कार्य हैं, आत्मा उनके संपर्क से सुख-दुःख का अनुभव करती है।
The body and senses are the work of Prakriti; the Self experiences pleasure and pain through contact with them.