श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 13 (क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga))

अध्याय 13 · श्लोक 22

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 35 3 मिनट का पठन 109 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् | कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु || २२ ||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

10 पद
पुरुष
पुरुष
प्रकृतिस्थ
प्रकृति में स्थित
हि
निश्चय ही
भुङ्क्ते
भोगता है
प्रकृतिजान्
प्रकृति से उत्पन्न
गुणान्
गुणों को
कारणम्
कारण
गुणसङ्ग
गुणों का संग
अस्य
इसका
सदसद्योनिजन्मसु
उत्तम और अधम योनियों में जन्म लेने में

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

यह पुरुष प्रकृति में स्थित होकर प्रकृति से उत्पन्न गुणों को भोगता है और इन गुणों का संग ही उसके सत्-असत् योनियों में जन्म लेने का कारण है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

आत्मा प्रकृति के संपर्क में आकर गुणों का भोग करती है, और इन गुणों के प्रति आसक्ति ही जन्म-मरण का कारण बनती है। The soul, in contact with nature, experiences its qualities, and attachment to these qualities causes birth in various species.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

प्रकृति में स्थित पुरुष प्रकृति से उत्पन्न गुणों का भोग करता है, और गुणों का संग ही उसके उत्तम-अधम योनियों में जन्म का कारण है।

The Purusha seated in Prakriti experiences the qualities born of Prakriti; attachment to these qualities is the cause of his births in good and evil wombs.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

गुणों से आसक्ति ही बंधन है। गुणों से ऊपर उठना ही मुक्ति है।

Attachment to qualities is bondage. Rising above them is liberation.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga)
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श्लोक 22/35 63% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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