श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 13 (क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga))

अध्याय 13 · श्लोक 27

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 35 3 मिनट का पठन 112 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् | क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ || २७ ||

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

9 पद
यावत्
जितना भी
सञ्जायते
उत्पन्न होता है
किञ्चित्
कुछ भी
सत्त्वम्
प्राणी या पदार्थ
स्थावरजङ्गमम्
स्थावर और जङ्गम
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्
क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से
तत्
उसको
विद्धि
जानो
भरतर्षभ
हे भरतश्रेष्ठ

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे भरतश्रेष्ठ! जितने भी स्थावर और जङ्गम प्राणी उत्पन्न होते हैं, उन सबको क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से ही जानो।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

संसार में जितने भी प्राणी हैं, वे सब शरीर (क्षेत्र) और आत्मा (क्षेत्रज्ञ) के संयोग से उत्पन्न होते हैं। All beings in the world are born from the union of the body (field) and the self (knower of the field).

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे भरतश्रेष्ठ! जितने भी स्थावर और जङ्गम प्राणी उत्पन्न होते हैं, उन सबको क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से ही जानो।

Wherever a being is born, whether unmoving or moving, know it to be from the union of the field and its knower, O best of the Bharatas.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

सृष्टि का प्रत्येक प्राणी शरीर-आत्मा के संयोग से बना है। आत्मा अलग है, शरीर अलग।

Every creature is a combination of body and soul. The soul is distinct from the body.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 13: क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (Kshetra Kshetragya Vibhag Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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