श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 14 (गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 14 · श्लोक 12

गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 27 3 मिनट का पठन 110 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा । रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥ १२॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
लोभः
लोभ
प्रवृत्तिः
प्रवृत्ति
आरम्भः
आरंभ
कर्मणाम्
कर्मों का
अशमः
अशांति
स्पृहा
स्पृहा (इच्छा)
रजसि
रजोगुण में
एतानि
ये
जायन्ते
उत्पन्न होते हैं
विवृद्धे
बढ़े हुए
भरतर्षभ
हे भरतश्रेष्ठ।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे भरतश्रेष्ठ! रजोगुण के बढ़ने पर लोभ, प्रवृत्ति, कर्मों का आरम्भ, अशांति और इच्छा उत्पन्न होती हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

रजोगुण के लक्षण: लोभ, अत्यधिक सक्रियता, आरम्भ, अशांति और तीव्र इच्छाएँ। Characteristics of Rajas: greed, constant activity, initiating many works, restlessness, and desires.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कहते हैं कि हे भरतर्षभ! जब रजोगुण बढ़ता है तो लोभ, प्रवृत्ति, कर्मों का आरम्भ, अशांति और इच्छाएँ उत्पन्न होती हैं। When Rajas predominates, greed, activity, undertaking of actions, restlessness, and desire appear.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

रजोगुण के प्रभाव में व्यक्ति अशांत और लालसापूर्ण कर्मों में लगा रहता है। Under the influence of Rajas, one remains restless and engaged in desire-prompted actions.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 14: गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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