मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा । रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥ १२॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
11 पदलोभः
लोभ
प्रवृत्तिः
प्रवृत्ति
आरम्भः
आरंभ
कर्मणाम्
कर्मों का
अशमः
अशांति
स्पृहा
स्पृहा (इच्छा)
रजसि
रजोगुण में
एतानि
ये
जायन्ते
उत्पन्न होते हैं
विवृद्धे
बढ़े हुए
भरतर्षभ
हे भरतश्रेष्ठ।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे भरतश्रेष्ठ! रजोगुण के बढ़ने पर लोभ, प्रवृत्ति, कर्मों का आरम्भ, अशांति और इच्छा उत्पन्न होती हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
रजोगुण के लक्षण: लोभ, अत्यधिक सक्रियता, आरम्भ, अशांति और तीव्र इच्छाएँ। Characteristics of Rajas: greed, constant activity, initiating many works, restlessness, and desires.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान कहते हैं कि हे भरतर्षभ! जब रजोगुण बढ़ता है तो लोभ, प्रवृत्ति, कर्मों का आरम्भ, अशांति और इच्छाएँ उत्पन्न होती हैं। When Rajas predominates, greed, activity, undertaking of actions, restlessness, and desire appear.
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
रजोगुण के प्रभाव में व्यक्ति अशांत और लालसापूर्ण कर्मों में लगा रहता है। Under the influence of Rajas, one remains restless and engaged in desire-prompted actions.