श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 14 (गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 14 · श्लोक 16

गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 27 3 मिनट का पठन 104 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् । रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम् ॥ १६॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
कर्मणः
कर्म का
सुकृतस्य
शुभ (कर्म)
आहुः
कहते हैं
सात्त्विकम्
सात्त्विक
निर्मलम्
निर्मल
फलम्
फल
रजसः
रजोगुण (के कर्म) का
तु
तो
फलम्
फल
दुःखम्
दुःख
अज्ञानम्
अज्ञान
तमसः
तमोगुण (के कर्म) का
फलम्
फल।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

शुभ कर्म का फल सात्त्विक और निर्मल कहा गया है, रजोगुण का फल दुःख है, और तमोगुण का फल अज्ञान है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

प्रत्येक गुण के अनुसार कर्मों के फल अलग-अलग होते हैं: सात्त्विक कर्म सुखद, राजस कर्म दुःखद, तामस कर्म अज्ञानकारक। The fruits correspond to the gunas: Sattvic actions yield purity and happiness; Rajasic, pain; Tamasic, ignorance.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कहते हैं कि शुभ कर्मों का फल सात्त्विक और निर्मल होता है, रजोगुणी कर्मों का फल दुःख है, और तमोगुणी कर्मों का फल अज्ञान है। The fruit of good (Sattvic) action is pure; the fruit of Rajasic action is pain; the fruit of Tamasic action is ignorance.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

इसलिए मनुष्य को सात्त्विक कर्म करने चाहिए और राजस-तामस कर्मों से बचना चाहिए। Hence, one should perform Sattvic actions and avoid Rajasic and Tamasic ones.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 14: गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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