मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् । रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम् ॥ १६॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदकर्मणः
कर्म का
सुकृतस्य
शुभ (कर्म)
आहुः
कहते हैं
सात्त्विकम्
सात्त्विक
निर्मलम्
निर्मल
फलम्
फल
रजसः
रजोगुण (के कर्म) का
तु
तो
फलम्
फल
दुःखम्
दुःख
अज्ञानम्
अज्ञान
तमसः
तमोगुण (के कर्म) का
फलम्
फल।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
शुभ कर्म का फल सात्त्विक और निर्मल कहा गया है, रजोगुण का फल दुःख है, और तमोगुण का फल अज्ञान है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
प्रत्येक गुण के अनुसार कर्मों के फल अलग-अलग होते हैं: सात्त्विक कर्म सुखद, राजस कर्म दुःखद, तामस कर्म अज्ञानकारक। The fruits correspond to the gunas: Sattvic actions yield purity and happiness; Rajasic, pain; Tamasic, ignorance.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान कहते हैं कि शुभ कर्मों का फल सात्त्विक और निर्मल होता है, रजोगुणी कर्मों का फल दुःख है, और तमोगुणी कर्मों का फल अज्ञान है। The fruit of good (Sattvic) action is pure; the fruit of Rajasic action is pain; the fruit of Tamasic action is ignorance.
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
इसलिए मनुष्य को सात्त्विक कर्म करने चाहिए और राजस-तामस कर्मों से बचना चाहिए। Hence, one should perform Sattvic actions and avoid Rajasic and Tamasic ones.