श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 14 (गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 14 · श्लोक 17

गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 27 3 मिनट का पठन 135 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सत्त्वात्संजायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च । प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥ १७॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
सत्त्वात्
सत्त्व से
संजायते
उत्पन्न होता है
ज्ञानम्
ज्ञान
रजसः
रज से
लोभः
लोभ
एव
ही
च
और
प्रमाद-मोहौ
प्रमाद और मोह
तमसः
तम से
भवतः
उत्पन्न होते हैं
अज्ञानम्
अज्ञान
एव
ही
च
और।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

सत्त्व से ज्ञान उत्पन्न होता है, रज से लोभ, और तम से प्रमाद, मोह तथा अज्ञान उत्पन्न होते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

गुणों के स्रोत से विभिन्न भाव निकलते हैं: सत्त्व से ज्ञान, रज से लोभ, तम से मोह और अज्ञान। From each guna arise different dispositions: knowledge from Sattva, greed from Rajas, delusion and ignorance from Tamas.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कहते हैं कि सत्त्व से ज्ञान उत्पन्न होता है, रज से लोभ, और तम से प्रमाद, मोह तथा अज्ञान उत्पन्न होते हैं। From Sattva arises knowledge; from Rajas, greed; from Tamas, heedlessness, delusion, and ignorance.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

इसलिए ज्ञान की प्राप्ति के लिए सत्त्व बढ़ाना आवश्यक है, और लोभ-मोह से बचने के लिए रज-तम का ह्रास करना चाहिए। Therefore, to attain knowledge one must increase Sattva, and to avoid greed and delusion one should reduce Rajas and Tamas.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 14: गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga)
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श्लोक 17/27 63% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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