श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 14 (गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 14 · श्लोक 19

गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 27 3 मिनट का पठन 110 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति । गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥ १९॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
न
नहीं
अन्यम्
दूसरा
गुणेभ्यः
गुणों से
कर्तारम्
कर्ता
यदा
जब
द्रष्टा
देखने वाला
अनुपश्यति
देखता है
गुणेभ्यः
गुणों से
च
और
परम्
परे
वेत्ति
जानता है
मद्भावम्
मेरे भाव को
सः
वह
अधिगच्छति
प्राप्त होता है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जब द्रष्टा (ज्ञानी) गुणों के अतिरिक्त किसी अन्य कर्ता को नहीं देखता और गुणों से परे (तत्व) को जान लेता है, तब वह मेरे भाव को प्राप्त हो जाता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

जब साधक यह समझ लेता है कि केवल गुण ही कर्म कर रहे हैं, और वह स्वयं उनसे परे है, तो वह भगवत्प्राप्ति कर लेता है। When one realizes that the gunas alone act and one is beyond them, they attain the Lord.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कहते हैं कि जब ज्ञानी पुरुष गुणों के अतिरिक्त किसी अन्य कर्ता को नहीं देखता और गुणों से परे तत्व को जान लेता है, तब वह मेरे स्वरूप को प्राप्त हो जाता है। When the seer perceives no agent other than the gunas and knows That which is beyond them, he attains to My being.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

यही आत्मज्ञान है - कर्तृत्व का त्याग और परमात्मा में स्थिति। This is self-realization: renouncing doership and abiding in the Supreme.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 14: गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 19 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 19/27 70% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!