श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 14 (गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 14 · श्लोक 2

गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 27 3 मिनट का पठन 117 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः । सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥ २॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
इदम्
इस
ज्ञानम्
ज्ञान को
उपाश्रित्य
आश्रय लेकर
मम
मेरे
साधर्म्यम्
समान स्वभाव को
आगताः
प्राप्त हुए
सर्गेऽपि
सृष्टि में भी
न
नहीं
उपजायन्ते
उत्पन्न होते
प्रलये
प्रलय में
न
नहीं
व्यथन्ति
व्यथित होते
च
और।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

इस ज्ञान का आश्रय लेकर वे मेरे समान स्वभाव को प्राप्त हो जाते हैं। न तो वे सृष्टि में उत्पन्न होते हैं और न प्रलय में व्यथित होते हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

जो इस ज्ञान को धारण कर लेता है वह भगवत्स्वरूप हो जाता है। फिर उसके लिए न जन्म है न मृत्यु। One who attains this knowledge becomes one with the Lord, beyond birth and death.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

इस ज्ञान का आश्रय लेने से साधक भगवान के समान धर्म वाला हो जाता है। वह सृष्टि के आरम्भ में जन्म नहीं लेता और प्रलय में भयभीत नहीं होता। By resorting to this knowledge, one attains the same nature as the Lord, and remains unaffected by creation and dissolution.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

आत्मज्ञानी पुरुष प्रकृति के कार्यों से परे हो जाता है। वह सृष्टि और प्रलय के समय भी अविकारी रहता है। The self-realized soul transcends the workings of nature and remains immutable during cosmic changes.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 14: गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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