मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः । सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥ २॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदइदम्
इस
ज्ञानम्
ज्ञान को
उपाश्रित्य
आश्रय लेकर
मम
मेरे
साधर्म्यम्
समान स्वभाव को
आगताः
प्राप्त हुए
सर्गेऽपि
सृष्टि में भी
न
नहीं
उपजायन्ते
उत्पन्न होते
प्रलये
प्रलय में
न
नहीं
व्यथन्ति
व्यथित होते
च
और।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
इस ज्ञान का आश्रय लेकर वे मेरे समान स्वभाव को प्राप्त हो जाते हैं। न तो वे सृष्टि में उत्पन्न होते हैं और न प्रलय में व्यथित होते हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
जो इस ज्ञान को धारण कर लेता है वह भगवत्स्वरूप हो जाता है। फिर उसके लिए न जन्म है न मृत्यु। One who attains this knowledge becomes one with the Lord, beyond birth and death.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
इस ज्ञान का आश्रय लेने से साधक भगवान के समान धर्म वाला हो जाता है। वह सृष्टि के आरम्भ में जन्म नहीं लेता और प्रलय में भयभीत नहीं होता। By resorting to this knowledge, one attains the same nature as the Lord, and remains unaffected by creation and dissolution.
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
आत्मज्ञानी पुरुष प्रकृति के कार्यों से परे हो जाता है। वह सृष्टि और प्रलय के समय भी अविकारी रहता है। The self-realized soul transcends the workings of nature and remains immutable during cosmic changes.