श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 14 (गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 14 · श्लोक 4

गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 27 3 मिनट का पठन 124 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः । तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥ ४॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
सर्वयोनिषु
सभी योनियों में
कौन्तेय
हे कुन्तीपुत्र
मूर्तयः
शरीर
सम्भवन्ति
उत्पन्न होते हैं
याः
जो
तासाम्
उन सबकी
ब्रह्म महत्
महद्ब्रह्म
योनिः
योनी
अहम्
मैं
बीजप्रदः
बीज देने वाला
पिता
पिता।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे कुन्तीपुत्र! जितनी भी योनियों में जो-जो मूर्तियाँ (शरीर) उत्पन्न होती हैं, उन सबकी योनी महद्ब्रह्म है और मैं बीज देने वाला पिता हूँ।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

भगवान स्पष्ट करते हैं कि सभी शरीरों की जननी प्रकृति है और वे स्वयं बीजरूप जीव के दाता पिता हैं। The Lord clarifies that nature is the mother of all bodies and He is the father who gives the seed of life.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान अर्जुन से कहते हैं कि सभी योनियों में जितने भी शरीर उत्पन्न होते हैं, उन सबकी जननी महद्ब्रह्म (प्रकृति) है और मैं बीज प्रदान करने वाला पिता हूँ। The Lord tells Arjuna that the great Brahman (nature) is the womb of all forms, and He is the seed-giving father.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

ईश्वर समस्त जीवों के परम पिता हैं। सभी जीव उनकी संतान हैं, अतः सबमें समान भाव रखना चाहिए। God is the universal father; all living beings are His children, hence we should see equality in all.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 14: गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga)
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श्लोक 4/27 15% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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