मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः । निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥ ५॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
11 पदसत्त्वम्
सत्त्व
रजः
रज
तमः
तम
इति
इस प्रकार
गुणाः
गुण
प्रकृतिसम्भवाः
प्रकृति से उत्पन्न
निबध्नन्ति
बांधते हैं
महाबाहो
हे महाबाहो
देहे
शरीर में
देहिनम्
शरीरी (आत्मा)
अव्ययम्
अविनाशी।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे महाबाहो! सत्त्व, रज और तम - ये तीनों गुण प्रकृति से उत्पन्न होते हैं और अविनाशी देही (आत्मा) को देह से बाँधते हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यहाँ तीन गुणों का परिचय दिया गया है। ये प्रकृति के कार्य हैं और आत्मा को शरीर से आसक्त कर देते हैं। Here the three gunas are introduced. They are products of nature and bind the soul to the body.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान कहते हैं कि सत्त्व, रज और तम - ये तीन गुण प्रकृति से उत्पन्न होते हैं। हे महाबाहो अर्जुन! ये गुण अविनाशी आत्मा को शरीर में रहकर बाँधते हैं। The Lord says that the three qualities—Sattva, Rajas, and Tamas—born of Prakriti, bind the imperishable soul to the body.
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
ये गुण आत्मा पर प्रभाव डालते हैं, लेकिन आत्मा वास्तव में इनसे परे है। इनके बंधन से मुक्त होना ही लक्ष्य है। These gunas influence the soul, but the soul is actually beyond them. Liberation means transcending them.