मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् । सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ ॥ ६॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
10 पदतत्र
उनमें से
सत्त्वम्
सत्त्व गुण
निर्मलत्वात्
निर्मल होने के कारण
प्रकाशकम्
प्रकाशक
अनामयम्
निष्पाप
सुखसङ्गेन
सुख के संग से
बध्नाति
बांधता है
ज्ञानसङ्गेन
ज्ञान के संग से
च
और
अनघ
हे निष्पाप।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
उनमें से सत्त्व गुण निर्मल होने के कारण प्रकाशक और निरोगी (पापरहित) है। हे निष्पाप अर्जुन! वह सुख के संग से और ज्ञान के संग से बाँधता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
सत्त्व गुण सुख और ज्ञान के माध्यम से आत्मा को बांधता है। यद्यपि यह शुद्ध है, फिर भी यह आसक्ति उत्पन्न करता है। Sattva binds through attachment to happiness and knowledge, though it is pure.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान कहते हैं कि तीनों गुणों में सत्त्व निर्मल, प्रकाशक और पापरहित है। हे अनघ अर्जुन! यह सुख के संग और ज्ञान के संग से जीव को बांधता है। Among the three, Sattva is pure, illuminating, and free from evil; it binds the soul through attachment to happiness and knowledge.
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
सत्त्व गुण में भी आसक्ति नहीं करनी चाहिए। सुख और ज्ञान के प्रति मोह भी बंधन का कारण है। Even Sattva, being a guna, creates bondage if one becomes attached to its effects like happiness and knowledge.