श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 14 (गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 14 · श्लोक 6

गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 27 3 मिनट का पठन 122 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् । सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ ॥ ६॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

10 पद
तत्र
उनमें से
सत्त्वम्
सत्त्व गुण
निर्मलत्वात्
निर्मल होने के कारण
प्रकाशकम्
प्रकाशक
अनामयम्
निष्पाप
सुखसङ्गेन
सुख के संग से
बध्नाति
बांधता है
ज्ञानसङ्गेन
ज्ञान के संग से
च
और
अनघ
हे निष्पाप।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

उनमें से सत्त्व गुण निर्मल होने के कारण प्रकाशक और निरोगी (पापरहित) है। हे निष्पाप अर्जुन! वह सुख के संग से और ज्ञान के संग से बाँधता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

सत्त्व गुण सुख और ज्ञान के माध्यम से आत्मा को बांधता है। यद्यपि यह शुद्ध है, फिर भी यह आसक्ति उत्पन्न करता है। Sattva binds through attachment to happiness and knowledge, though it is pure.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कहते हैं कि तीनों गुणों में सत्त्व निर्मल, प्रकाशक और पापरहित है। हे अनघ अर्जुन! यह सुख के संग और ज्ञान के संग से जीव को बांधता है। Among the three, Sattva is pure, illuminating, and free from evil; it binds the soul through attachment to happiness and knowledge.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

सत्त्व गुण में भी आसक्ति नहीं करनी चाहिए। सुख और ज्ञान के प्रति मोह भी बंधन का कारण है। Even Sattva, being a guna, creates bondage if one becomes attached to its effects like happiness and knowledge.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 14: गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga)
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श्लोक 6/27 22% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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