श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 14 (गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga))

अध्याय 14 · श्लोक 7

गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 27 3 मिनट का पठन 121 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् । तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् ॥ ७॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

9 पद
रजः
रज गुण
रागात्मकम्
राग (आसक्ति) स्वरूप
विद्धि
जानो
तृष्णा-सङ्ग-समुद्भवम्
तृष्णा और आसक्ति से उत्पन्न
तत्
वह
निबध्नाति
बांधता है
कौन्तेय
हे कुन्तीपुत्र
कर्मसङ्गेन
कर्मों के संग से
देहिनम्
शरीरी को।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे कुन्तीपुत्र! रजोगुण को रागात्मक (आसक्ति स्वरूप) जानो, जो तृष्णा और संग से उत्पन्न होता है। वह कर्मों के संग से देही को बाँधता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

रजोगुण में तीव्र इच्छाएँ और आसक्ति होती है। यह व्यक्ति को कर्मों में उलझाकर बांधता है। Rajas is characterized by passion, thirst, and attachment; it binds the soul through involvement in actions.

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कहते हैं कि रजोगुण आसक्ति स्वरूप है, तृष्णा और संग से उत्पन्न होता है। हे कौन्तेय! यह कर्मों के संग से देही को बांधता है। Know Rajas as passionate, born of desire and attachment; it binds the embodied soul through attachment to action.

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

रजोगुण में रहकर व्यक्ति सदा कर्मों में व्यस्त रहता है और फल की आकांक्षा करता है, जिससे बंधन होता है। Under the influence of Rajas, one remains constantly engaged in actions with desire, leading to bondage.

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 14: गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya Vibhaga Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 7 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 7/27 26% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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