मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सत्त्वं सुखे संजयति रजः कर्मणि भारत । ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे संजयत्युत ॥ ९॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदसत्त्वम्
सत्त्व गुण
सुखे
सुख में
संजयति
बांधता है
रजः
रजोगुण
कर्मणि
कर्म में
भारत
हे भारत
ज्ञानम्
ज्ञान को
आवृत्य
आच्छादित करके
तु
तो
तमः
तमोगुण
प्रमादे
प्रमाद में
संजयति
बांधता है
उत
भी।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे भारत! सत्त्व गुण सुख में बाँधता है, रजोगुण कर्म में बाँधता है, और तमोगुण ज्ञान को ढककर प्रमाद में बाँधता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
प्रत्येक गुण का अपना बंधन है - सत्त्व सुख में, रज कर्म में, तम प्रमाद में। Each guna binds in its own way: Sattva to happiness, Rajas to action, Tamas to delusion.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान अर्जुन से कहते हैं कि सत्त्व सुख में बांधता है, रज कर्म में, और तम ज्ञान को ढककर प्रमाद में बांधता है। Sattva binds through attachment to happiness, Rajas through attachment to action, and Tamas by covering knowledge leads to heedlessness.
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
हर गुण मनुष्य को किसी न किसी प्रकार से बांधता है। इनसे परे जाना ही मुक्ति है। Each guna binds the soul in its own way; transcendence of all three is liberation.