मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् । विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ॥ १०॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
12 पदउत्क्रामन्तम्
जाते हुए (शरीर त्यागते हुए)
स्थितम्
स्थित (शरीर में रहते हुए)
वा
या
अपि
भी
भुञ्जानम्
भोग करते हुए
वा
या
गुणान्वितम्
गुणों से युक्त
विमूढा
मूढ़ (अज्ञानी) जन
न
नहीं
अनुपश्यन्ति
देख पाते
पश्यन्ति
देखते हैं
ज्ञानचक्षुषः
ज्ञान-चक्षु वाले (ज्ञानी)।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जाते हुए, शरीर में स्थित रहते हुए, या गुणों सहित विषयों को भोगते हुए जीव को मूढ़ (अज्ञानी) लोग नहीं देख पाते, किन्तु ज्ञान-चक्षु वाले (ज्ञानी) उसे देखते हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यह श्लोक जीव की सूक्ष्म गतिविधियों को देखने की क्षमता का वर्णन करता है। अज्ञानी जीव के शरीर त्यागने, रहने या भोग करने की वास्तविकता को नहीं समझते, जबकि ज्ञानी जन आत्म-साक्षात्कार द्वारा उसे देखते हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जीव जब शरीर त्यागता है, जब शरीर में स्थित रहता है, या जब गुणों के साथ विषयों का भोग करता है, तब अज्ञानी (विमूढ़) उसे नहीं देख पाते। किन्तु ज्ञान-चक्षु वाले (ज्ञानी) उसे देखते हैं, अर्थात आत्मा की गतिविधियों को समझते हैं।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
आत्मा अत्यंत सूक्ष्म है, वह इंद्रियों या मन का विषय नहीं है। उसे केवल ज्ञान (विवेक) से देखा जा सकता है। ज्ञानीजन आत्मा को शरीर से भिन्न जानते हैं, इसलिए वे जन्म-मरण से परे हो जाते हैं।