मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् । यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः ॥ ११॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
14 पदयतन्तः
प्रयत्न करते हुए
योगिनः
योगी जन
च
और
एनम्
इस (आत्मा) को
पश्यन्ति
देखते हैं
आत्मनि
अपने में
अवस्थितम्
स्थित
यतन्तः
प्रयत्न करते हुए
अपि
भी
अकृतात्मानः
अशुद्ध अन्तःकरण वाले (जिन्होंने आत्मा को नहीं जाना)
न
नहीं
एनम्
इसे
पश्यन्ति
देखते
अचेतसः
बुद्धिहीन (विवेकहीन)।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
प्रयत्नशील योगीजन इस आत्मा को अपने ही भीतर स्थित देखते हैं, किन्तु अशुद्ध अन्तःकरण वाले अप्रबुद्ध (अचेतस) जन प्रयत्न करते हुए भी उसे नहीं देख पाते।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यह श्लोक आत्म-साक्षात्कार के लिए आवश्यक शर्त बताता है – केवल प्रयत्न ही नहीं, अपितु अन्तःकरण की शुद्धि और विवेक भी आवश्यक है। योगीजन साधना द्वारा आत्मा को देख लेते हैं, किन्तु अशुद्ध मन वाले नहीं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जो योगी साधना में प्रयत्नशील रहते हैं, वे आत्मा को अपने ही भीतर स्थित देखते हैं (अनुभव करते हैं)। परंतु जिनका अन्तःकरण शुद्ध नहीं हुआ है (अकृतात्मानः) और जो विवेकहीन हैं (अचेतसः), वे प्रयत्न करते हुए भी आत्मा को नहीं देख पाते।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
आत्म-साक्षात्कार के लिए केवल बाहरी प्रयत्न ही नहीं, अपितु अन्तःकरण की शुद्धि और विवेक भी आवश्यक है। अतः साधक को पहले मन की शुद्धि पर ध्यान देना चाहिए, फिर आत्म-चिंतन करना चाहिए।