श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 15 (पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga))

अध्याय 15 · श्लोक 9

पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 20 3 मिनट का पठन 120 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च । अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥ ९॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
श्रोत्रम्
कान
चक्षुः
आँख
स्पर्शनम्
त्वचा
च
और
रसनम्
जीभ
घ्राणम्
नाक
एव
ही
च
भी
अधिष्ठाय
अधिष्ठान करके (आश्रय लेकर)
मनः
मन
च
और
अयम्
यह (जीव)
विषयान्
विषयों को
उपसेवते
भोगता है।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

कान, आँख, त्वचा, जीभ, नाक और मन का आश्रय लेकर यह (जीव) विषयों को भोगता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

यह श्लोक बताता है कि जीव शरीर में रहते हुए किस प्रकार इंद्रियों और मन के द्वारा विषयों का भोग करता है। वह इनका स्वामी नहीं, बल्कि इनके अधीन होकर भोग करता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जीव शरीर में रहकर श्रोत्र (कान), चक्षु (आँख), स्पर्शन (त्वचा), रसना (जीभ), घ्राण (नाक) तथा मन – इन सबका आश्रय लेकर शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध आदि विषयों का भोग करता है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

जीव की विषयों में आसक्ति ही बंधन का कारण है। वह सोचता है कि मैं भोग कर रहा हूँ, जबकि वास्तव में वह इंद्रियों और मन के माध्यम से प्रकृति के साथ क्रीड़ा कर रहा है। यह भोग ही उसे पुनर्जन्म के चक्र में डालता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 15: पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga)
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श्लोक 9/20 45% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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