मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा । पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥ १३॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
14 पदगाम्
पृथ्वी में
आविश्य
प्रवेश करके
च
और
भूतानि
सम्पूर्ण प्राणियों को
धारयामि
धारण करता हूँ
अहम्
मैं
ओजसा
अपनी शक्ति से
पुष्णामि
पोषण करता हूँ
च
और
औषधीः
औषधियों (वनस्पतियों) को
सर्वाः
सब
सोमः
सोम (चन्द्र या रस) रूप
भूत्वा
होकर
रसात्मकः
रस स्वरूप।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
पृथ्वी में प्रवेश करके मैं अपनी शक्ति से सम्पूर्ण प्राणियों को धारण करता हूँ, तथा रसस्वरूप सोम (चन्द्रमा) बनकर सब औषधियों (वनस्पतियों) का पोषण करता हूँ।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान बताते हैं कि वे पृथ्वी में प्रवेश करके अपनी ऊर्जा से सबको धारण करते हैं और चन्द्रमा के रूप में वनस्पतियों को रस प्रदान करते हैं।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान कृष्ण कहते हैं: पृथ्वी में प्रवेश करके मैं अपनी शक्ति (ओजसा) से समस्त प्राणियों को धारण करता हूँ। और रसात्मक सोम (चन्द्रमा) बनकर मैं सब वनस्पतियों का पोषण करता हूँ।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
परमात्मा ही सबका पोषक और धारक है। वह सृष्टि के प्रत्येक कण में व्याप्त है और अपनी शक्ति से सबका पालन करता है। यह उसकी व्यापकता और करुणा का प्रतीक है।