मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः । प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥ १४॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
10 पदअहम्
मैं
वैश्वानरः
वैश्वानर (जठराग्नि) रूप
भूत्वा
होकर
प्राणिनाम्
प्राणियों के
देहम्
शरीर में
आश्रितः
स्थित
प्राणापानसमायुक्तः
प्राण और अपान से युक्त
पचामि
पचाता हूँ
अन्नम्
अन्न
चतुर्विधम्
चार प्रकार का (चर्व्य, चूष्य, लेह्य, पेय)।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
मैं प्राणियों के शरीर में स्थित वैश्वानर (जठराग्नि) रूप होकर, प्राण और अपान से युक्त होकर चार प्रकार के अन्न को पचाता हूँ।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान बताते हैं कि वे ही जठराग्नि (वैश्वानर) के रूप में शरीर में रहते हैं और भोजन को पचाते हैं। यह उनकी सर्वव्यापकता का एक और उदाहरण है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान कृष्ण कहते हैं: मैं ही वैश्वानर (जठराग्नि) रूप में प्राणियों के शरीर में स्थित हूँ, और प्राण तथा अपान से युक्त होकर चार प्रकार के अन्न (चर्व्य, चूष्य, लेह्य, पेय) को पचाता हूँ।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
शरीर की समस्त क्रियाओं का संचालन परमात्मा ही करता है। वह पाचन क्रिया में भी अन्तर्यामी रूप में विद्यमान है। यह समझना चाहिए कि हमारा शरीर और उसकी सभी क्रियाएँ उसी की शक्ति से संचालित हैं।