श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 15 (पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga))

अध्याय 15 · श्लोक 15

पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 20 4 मिनट का पठन 109 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च । वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥ १५॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

21 पद
सर्वस्य
सबके
च
और
अहम्
मैं
हृदि
हृदय में
सन्निविष्टः
स्थित हूँ
मत्तः
मुझसे
स्मृतिः
स्मृति
ज्ञानम्
ज्ञान
अपोहनम्
विस्मरण (या तर्क-वितर्क)
च
और
वेदैः
वेदों द्वारा
च
और
सर्वैः
सब
अहम्
मैं
एव
ही
वेद्यः
जानने योग्य
वेदान्तकृत्
वेदान्त के कर्ता (वेदों का निर्माण करने वाला)
वेदवित्
वेदों को जानने वाला
एव
ही
च
और
अहम्
मैं हूँ।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

और मैं सबके हृदय में स्थित हूँ; मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और उनका अपोहन (तर्क-वितर्क या विस्मरण) होता है। मैं ही सब वेदों द्वारा जानने योग्य हूँ, वेदान्त का कर्ता (वेदों का निर्माता) और वेदों का ज्ञाता भी मैं ही हूँ।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

यह अत्यंत महत्वपूर्ण श्लोक है। भगवान कहते हैं कि वे सबके हृदय में अन्तर्यामी रूप में विराजमान हैं। उन्हीं से स्मृति, ज्ञान और विस्मरण (या तर्क) होते हैं। वे ही वेदों के ज्ञाता, वेदान्त के कर्ता और वेदों द्वारा जानने योग्य हैं।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

भगवान कहते हैं: मैं सबके हृदय में स्थित हूँ। मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और उनका अपोहन (विस्मरण या तर्क) होता है। मैं ही सभी वेदों द्वारा जानने योग्य हूँ; मैं ही वेदान्त का कर्ता (वेदों का रचयिता) हूँ और वेदों का ज्ञाता भी मैं ही हूँ।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

परमात्मा ही सबके हृदय में अन्तर्यामी के रूप में विद्यमान है। वही हमारे स्मरण, ज्ञान और विचारों का स्रोत है। सभी वेद उसी का गान करते हैं। अतः उसकी शरण में जाकर ही सच्चा ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 15: पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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