मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च । क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥ १६॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
15 पदद्वौ
दो
इमौ
ये
पुरुषौ
पुरुष
लोके
संसार में
क्षरः
क्षर (विनाशी)
च
और
अक्षरः
अक्षर (अविनाशी)
एव
ही
च
भी
क्षरः
क्षर
सर्वाणि
सब
भूतानि
प्राणी (भूत-समूह)
कूटस्थः
कूटस्थ (अपरिवर्तनशील)
अक्षरः
अक्षर
उच्यते
कहा जाता है।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
इस संसार में दो प्रकार के पुरुष हैं – क्षर (विनाशी) और अक्षर (अविनाशी)। क्षर तो सब प्राणी हैं, और कूटस्थ (अपरिवर्तनशील) अक्षर कहा जाता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान दो प्रकार के पुरुषों (तत्त्वों) का वर्णन करते हैं – क्षर (बदलने वाला, नाशवान) जो सभी जीव हैं, और अक्षर (अविनाशी, अपरिवर्तनशील) जो कूटस्थ (आत्मा या ब्रह्म) कहलाता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान कहते हैं: इस संसार में दो प्रकार के पुरुष हैं – एक क्षर (विनाशी) और दूसरा अक्षर (अविनाशी)। क्षर तो सभी भूत (प्राणी-समूह) हैं, और जो कूटस्थ (अपरिवर्तनशील) है, वह अक्षर कहलाता है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
सृष्टि में दो तत्त्व हैं – नाशवान जड़-चेतन (क्षर) और अविनाशी आत्मा या ब्रह्म (अक्षर)। जीव जब तक शरीर से तादात्म्य करता है, तब तक वह क्षर की श्रेणी में है, परंतु जब वह अपने वास्तविक अक्षर स्वरूप को जान लेता है, तो वह मुक्त हो जाता है।