श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 15 (पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga))

अध्याय 15 · श्लोक 17

पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 20 3 मिनट का पठन 109 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः । यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥ १७॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
उत्तमः पुरुषः
उत्तम पुरुष
तु
तो
अन्यः
अन्य (तीसरा)
परमात्मा
परमात्मा
इति
इस प्रकार
उदाहृतः
कहा जाता है
यः
जो
लोकत्रयम्
तीनों लोकों में
आविश्य
व्याप्त होकर
बिभर्ति
धारण करता है
अव्ययः
अविनाशी
ईश्वरः
ईश्वर।

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

किन्तु उनसे (क्षर-अक्षर से) भी भिन्न जो उत्तम पुरुष है, वह परमात्मा कहा गया है, जो तीनों लोकों में व्याप्त होकर उन्हें धारण करता है, अविनाशी ईश्वर।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

अब भगवान तीसरे पुरुष का वर्णन करते हैं – उत्तम पुरुष या परमात्मा। वह क्षर और अक्षर दोनों से परे है, तीनों लोकों में व्याप्त है, और सबका धारण-पोषण करता है। वह अविनाशी ईश्वर है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

क्षर और अक्षर से भिन्न एक और उत्तम पुरुष है, जिसे परमात्मा कहा जाता है। वह अविनाशी ईश्वर तीनों लोकों (स्वर्ग, मृत्यु, पाताल) में व्याप्त होकर सबको धारण करता है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

परमात्मा क्षर और अक्षर दोनों से परे है। वह सबका अन्तर्यामी है, सबको धारण करता है, और सबमें व्याप्त है। उसकी शरण में जाना ही मोक्ष का मार्ग है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 15: पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 17 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 17/20 85% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
श्लोक कॉपी कर लिया गया है!