मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः । अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥ १८॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
15 पदयस्मात्
क्योंकि
क्षरम्
क्षर से
अतीतः
अतीत (परे) हूँ
अहम्
मैं
अक्षरात्
अक्षर से
अपि
भी
च
और
उत्तमः
उत्तम हूँ
अतः
इसलिए
अस्मि
हूँ
लोके
लोक में
वेदे
वेदों में
च
और
प्रथितः
प्रसिद्ध
पुरुषोत्तमः
पुरुषोत्तम।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
क्योंकि मैं क्षर (विनाशी) से अतीत हूँ और अक्षर (अविनाशी) से भी उत्तम हूँ, इसलिए लोक में और वेदों में मैं पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हूँ।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
भगवान स्वयं को पुरुषोत्तम कहते हैं क्योंकि वे क्षर और अक्षर दोनों से परे और श्रेष्ठ हैं। यह उनका सर्वोच्च स्वरूप है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान कृष्ण कहते हैं: क्योंकि मैं क्षर (नाशवान प्राणियों) से परे हूँ और अक्षर (अविनाशी आत्मा) से भी उत्तम हूँ, इसलिए संसार में तथा वेदों में मैं पुरुषोत्तम (सर्वोत्तम पुरुष) के नाम से प्रसिद्ध हूँ।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भगवान का स्वरूप सबसे उच्च है। वे सभी जीवों (क्षर) और मुक्त आत्माओं (अक्षर) से भी परे हैं। उनकी भक्ति और शरणागति ही परम लक्ष्य है।