मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् । स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥ १९॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
12 पदयः
जो
माम्
मुझे
एवम्
इस प्रकार
असम्मूढः
मोहरहित (सम्मोह से रहित)
जानाति
जानता है
पुरुषोत्तमम्
पुरुषोत्तम के रूप में
सः
वह
सर्ववित्
सर्वज्ञ (सब कुछ जानने वाला)
भजति
भजता है
माम्
मुझे
सर्वभावेन
सब प्रकार से (सम्पूर्ण भाव से)
भारत
हे भारत (अर्जुन)।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे भारत! जो मोहरहित (असम्मूढ) पुरुष मुझे इस प्रकार पुरुषोत्तम के रूप में जान लेता है, वह सर्वज्ञ होकर (सब कुछ जानकर) सब भावों से मेरी भक्ति करता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
जो मनुष्य भगवान को पुरुषोत्तम के रूप में समझ लेता है (अर्थात उनके स्वरूप को जान लेता है), वह मोह से मुक्त हो जाता है, सब कुछ जान लेता है और पूर्ण भाव से भगवान की भक्ति करता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते हैं: हे भारत! जो मनुष्य मोहरहित होकर मुझे इस प्रकार (क्षर-अक्षर से परे) पुरुषोत्तम के रूप में जान लेता है, वह सर्वज्ञ (सब कुछ जानने वाला) हो जाता है और सब भावों से (अपने सम्पूर्ण अस्तित्व से) मेरी भक्ति करता है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
भगवान के सच्चे स्वरूप को जानना ही सच्चा ज्ञान है। यह ज्ञान सब कुछ जानने के समान है। ऐसा ज्ञानी मोह से मुक्त होकर पूर्ण समर्पण भाव से भगवान की भक्ति में लीन हो जाता है, जो मोक्ष का मार्ग है।