मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः । मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥ ७॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
10 पदमम
मेरा
एव
ही
अंशः
अंश
जीवलोके
जीव लोक (संसार) में
जीवभूतः
जीव रूप में स्थित
सनातनः
सनातन
मनःषष्ठानि
मन सहित छठे (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और मन)
इन्द्रियाणि
इन्द्रियाँ
प्रकृतिस्थानि
प्रकृति में स्थित
कर्षति
खींचता है (आकर्षित करता है)।
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
मेरा ही सनातन अंश जीव लोक में जीव रूप में स्थित है, जो प्रकृति में स्थित मन सहित छठी (पाँच ज्ञानेन्द्रियों) को खींचता है (अर्थात उनसे आसक्त होता है)।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यह श्लोक जीवात्मा की स्थिति बताता है – वह परमात्मा का ही अंश है, परंतु संसार में आकर वह मन और इंद्रियों से आसक्त हो जाता है। यह आसक्ति ही बंधन का कारण है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
भगवान कृष्ण कहते हैं कि यह जीवात्मा (जीव) मेरा ही सनातन अंश है। संसार में आकर यह प्रकृति से उत्पन्न पाँच ज्ञानेन्द्रियों और मन (छठी) को अपने साथ खींचता है, अर्थात उनसे आसक्त हो जाता है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
जीव का वास्तविक स्वरूप परमात्मा का अंश होना है, लेकिन माया के कारण वह अपने को शरीर और इंद्रियों से तादात्म्य कर लेता है। यही भ्रम है। इस भ्रम से मुक्त होना ही मोक्ष है।