मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्। असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह॥२८॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
18 पदअश्रद्धया
without faith
हुतम्
offered in sacrifice
दत्तम्
given
तप
austerity
तप्तम्
practiced
कृतम्
done
च
and
यत्
which
असत्
Asat
इति
thus
उच्यते
is called
पार्थ
O Partha
न
not
च
and
तत्
that
प्रेत्य
in the next world
नो
nor
इह
in this world.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
हे पार्थ! जो यज्ञ (हवन) किया जाता है, जो दान दिया जाता है, जो तप तपा जाता है और जो भी कर्म बिना श्रद्धा के किया जाता है – वह "असत्" कहलाता है। उसका कोई फल इस लोक में नहीं मिलता और न ही परलोक में।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यह अध्याय का अन्तिम श्लोक निष्कर्ष प्रस्तुत करता है: बिना श्रद्धा के किए गए सभी धार्मिक कर्म (यज्ञ, दान, तप) निष्फल होते हैं। वे "असत्" (असत्य/नकार्थक) हैं और न इस लोक में सुख देते हैं, न परलोक में। श्रद्धा ही सब कर्मों की आत्मा है। This concluding verse emphasizes that all acts of sacrifice, charity, and austerity performed without faith are "Asat" – they are useless and yield no results either in this world or the next. Faith is the essence of all spiritual actions.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
हे पार्थ (अर्जुन)! बिना श्रद्धा के जो कुछ भी यज्ञ (हवन) किया जाता है, दान दिया जाता है, तप तपा जाता है, अथवा कोई भी कर्म किया जाता है – वह "असत्" कहलाता है। उसका कोई सदुपयोग नहीं; न इस लोक में उससे सुख मिलता है, न परलोक में।
O Partha (Arjuna)! Whatever sacrifice, charity, austerity, or any action is performed without faith – that is called "Asat". It is of no value; it yields no results in this world nor in the next.