मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते। कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते॥२७॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
17 पदयज्ञे
in sacrifice
तपसि
in austerity
दाने
in charity
च
and
स्थिति
steadfastness
सत्
Sat
इति
thus
च
and
उच्यते
is called
कर्म
action
च
and
एव
indeed
तदर्थीयम्
meant for that (the Supreme)
सत्
Sat
इति
thus
एव
certainly
अभिधीयते
is described.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
यज्ञ, तप और दान में स्थिति (निष्ठा) को भी "सत्" कहा जाता है, तथा उस परमात्मा के लिए किया गया कर्म भी "सत्" ही कहलाता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
इस श्लोक में "सत्" का एक और अर्थ बताया गया है – यज्ञ, तप और दान में दृढ़ निष्ठा को "सत्" कहते हैं। इसके अलावा, जो कर्म केवल परमात्मा के लिए (भगवदर्पण) किया जाता है, वह भी "सत्" है। Steadfastness in sacrifice, austerity, and charity is designated as Sat. Also, any action performed solely for the Supreme is called Sat.
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
"सत्" शब्द का एक और प्रयोग बताया गया है: यज्ञ, तप और दान में स्थित (दृढ़) रहना भी "सत्" कहलाता है। इसके अलावा, जो भी कर्म उस परमात्मा के उद्देश्य से (उनकी प्रसन्नता के लिए) किया जाता है, वह भी "सत्" ही कहा जाता है।
Steadfastness in performing sacrifice, austerity, and charity is also called Sat. Moreover, any action that is done for the sake of the Supreme (dedicated to Him) is certainly termed Sat.