श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 18 (मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga))

अध्याय 18 · श्लोक 10

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 78 2 मिनट का पठन 108 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते। त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः॥१०॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

11 पद
न
not
द्वेष्टि
hates
अकुशलम्
unfavourable
कर्म
action
कुशले
in favourable
न
not
अनुषज्जते
is attached
त्यागी
the renouncer
सत्त्व-समाविष्टः
imbued with sattva
मेधावी
intelligent
छिन्न-संशयः
one whose doubts are cut.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो त्यागी सत्त्वगुण से युक्त, मेधावी और संशयरहित है, वह अकुशल कर्म से द्वेष नहीं करता और कुशल कर्म में आसक्त नहीं होता।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

सात्त्विक त्यागी का स्वरूप: वह कर्मों के प्रति राग-द्वेष से मुक्त होता है। वह जानता है कि कर्म तो करने हैं, पर उनके प्रति आसक्ति नहीं।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जो त्यागी सत्त्वगुण से परिपूर्ण, बुद्धिमान और संशयरहित है, वह अशुभ कर्म से द्वेष नहीं करता और शुभ कर्म में आसक्त नहीं होता।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

सच्चा संन्यासी कर्मों के प्रति तटस्थ रहता है। वह समझता है कि सभी कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा होते हैं, आत्मा अकर्ता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 18: मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga)
वर्तमान में आप श्लोक संख्या 10 का अध्ययन कर रहे हैं।
श्लोक 10/78 13% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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