श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 18 (मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga))

अध्याय 18 · श्लोक 15

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 78 2 मिनट का पठन 113 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः। न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः॥१५॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
शरीर-वाक्-मनोभिः
with body, speech, and mind
यत्
which
कर्म
action
प्रारभते
undertakes
नरः
a man
न्याय्यम्
right
वा
or
विपरीतम्
wrong
वा
or
पञ्च
five
एते
these
तस्य
its
हेतवः
causes.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

शरीर, वाणी और मन से मनुष्य जो कुछ कर्म करता है, चाहे वह उचित हो या अनुचित, उसके ये पाँच कारण हैं।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

इस प्रकार शुभाशुभ सभी कर्मों के मूल में ये पाँच कारण विद्यमान हैं। इसलिए जीव को कर्तापन के अभिमान से मुक्त होना चाहिए।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

शरीर, वाणी और मन द्वारा मनुष्य जो भी कर्म करता है – चाहे वह शास्त्रसम्मत हो या विपरीत – उन सबके ये पाँच ही कारण हैं।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

इस ज्ञान से यह समझ आता है कि कर्तापन का अभिमान मिथ्या है। वास्तव में तो ये पाँच कारण मिलकर कर्म को जन्म देते हैं, आत्मा निर्लिप्त है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 18: मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga)
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श्लोक 15/78 19% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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