श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 18 (मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga))

अध्याय 18 · श्लोक 16

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 78 2 मिनट का पठन 109 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः। पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः॥१६॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

14 पद
तत्र
there
एवम्
thus
सति
being
कर्तारम्
the doer
आत्मानम्
the self
केवलम्
alone
तु
but
यः
who
पश्यति
sees
अकृत-बुद्धित्वात्
due to untrained intellect
न
not
स
he
पश्यति
sees
दुर्मतिः
evil-minded.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

ऐसी स्थिति में जो असंस्कृत बुद्धि वाला मनुष्य केवल आत्मा को ही कर्ता मानता है, वह दुर्मति ठीक से नहीं देखता।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

जो व्यक्ति अविवेकी है और आत्मा को ही एकमात्र कर्ता मानता है, वह वास्तविकता को नहीं समझता। वह पाँच कारणों की भूमिका को नकारकर भ्रम में पड़ जाता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

इस प्रकार जब पाँच कारण हैं, तब जो अशुद्ध बुद्धि वाला मनुष्य केवल आत्मा को ही कर्ता मानता है, वह दुर्मति यथार्थ नहीं देखता।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

कर्तापन का श्रेय आत्मा को देना अज्ञान है। आत्मा तो अकर्ता है, साक्षी है। यह ज्ञान ही बन्धन मुक्ति का कारण है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 18: मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga)
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श्लोक 16/78 21% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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