मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते। हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते॥१७॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
17 पदयस्य
whose
न
not
अहंकृतः
of ego
भावः
sense
बुद्धिः
intellect
यस्य
whose
न
not
लिप्यते
is attached
हत्वा
having killed
अपि
even
स
he
इमान्
these
लोकान्
beings
न
not
हन्ति
kills
न
not
निबध्यते
is bound.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जिसमें अहंकार का भाव नहीं है और जिसकी बुद्धि आसक्त नहीं है, वह इन सब लोगों को मारकर भी न तो मारता है और न बँधता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यह श्लोक अहंकाररहित स्थितप्रज्ञ के लक्षण बताता है। ऐसा व्यक्ति कर्म करते हुए भी कर्तापन के अभिमान से मुक्त रहता है, इसलिए वह पाप या बन्धन का भागी नहीं होता।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जिसमें अहंकार का भाव नहीं है और जिसकी बुद्धि आसक्त नहीं है, वह इन सब लोकों को (लोगों को) मारकर भी न तो मारता है और न बँधता है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
अहंकार के अभाव में कर्म कर्ता को छूते नहीं। ऐसा व्यक्ति केवल निमित्त मात्र है। इसलिए निष्काम कर्मयोगी बन्धन मुक्त रहता है।