मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना। करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः॥१८॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
11 पदज्ञानम्
knowledge
ज्ञेयम्
the object of knowledge
परिज्ञाता
the knower
त्रि-विधा
threefold
कर्म-चोदना
impetus to action
करणम्
instrument
कर्म
action
कर्ता
doer
इति
thus
त्रि-विधः
threefold
कर्म-संग्रहः
compendium of action.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता – ये तीन प्रकार की कर्मप्रेरणा हैं। करण, कर्म और कर्ता – ये तीन प्रकार का कर्मसंग्रह (कर्म का समूह) है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
इस श्लोक में कर्म के दो त्रिविध वर्ग बताए गए हैं। पहला: ज्ञान, ज्ञेय, ज्ञाता – ये कर्म की प्रेरणा के स्रोत हैं। दूसरा: करण (इन्द्रियाँ), कर्म (क्रिया), कर्ता – ये कर्म के अंग हैं। यह वर्गीकरण कर्म के स्वरूप को समझने में सहायक है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता – ये तीन कर्म की प्रेरणा (चोदना) हैं। तथा करण (इन्द्रियाँ), कर्म और कर्ता – ये तीन कर्म का संग्रह (आधार) हैं।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
इस वर्गीकरण से यह समझ आता है कि कर्म का सम्पूर्ण ढाँचा इन छह तत्वों में समाहित है। इनके यथार्थ ज्ञान से कर्म के रहस्य का बोध होता है।