श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 18 (मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga))

अध्याय 18 · श्लोक 21

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 78 2 मिनट का पठन 107 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्। वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्॥२१॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
पृथक्त्वेन
as separate
तु
but
यत्
which
ज्ञानम्
knowledge
नाना-भावान्
diverse entities
पृथक्-विधान्
of various kinds
वेत्ति
knows
सर्वेषु
in all
भूतेषु
beings
तत्
that
ज्ञानम्
knowledge
विद्धि
know
राजसम्
rajasic.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

किन्तु जो ज्ञान सम्पूर्ण भूतों में नाना प्रकार के पृथक् भावों को अलग-अलग जानता है, उस ज्ञान को राजस जानो।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

राजस ज्ञान भेददर्शी है। यह प्राणियों में विभिन्नता और पृथक्त्व को ही देखता है, एकत्व का अनुभव नहीं कर पाता। यह अपूर्ण और द्वैत पर आधारित ज्ञान है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जो ज्ञान समस्त प्राणियों में विविध प्रकार के पृथक्-पृथक् भावों को (अलग-अलग) देखता है, उस ज्ञान को राजस जानो।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

राजस ज्ञान भेद पर आधारित है। यह संसार में व्याप्त विभिन्नता को तो देखता है, पर उसके पीछे एक सूत्र को नहीं पकड़ पाता। यह अधूरा ज्ञान है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 18: मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga)
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श्लोक 21/78 27% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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