मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम्। अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते॥२३॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
10 पदनियतम्
regulated
सङ्ग-रहितम्
without attachment
अराग-द्वेषतः
without love or hatred
कृतम्
done
अफल-प्रेप्सुना
by one who desires no fruit
कर्म
action
यत्
which
तत्
that
सात्त्विकम्
sattvic
उच्यते
is called.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जो कर्म नियत (शास्त्रविहित) है, आसक्ति रहित है, राग-द्वेष से रहित होकर और फल की इच्छा न रखने वाले पुरुष द्वारा किया जाता है – वह सात्त्विक कहलाता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
सात्त्विक कर्म के चार लक्षण हैं: १. शास्त्रविहित (नियत), २. आसक्ति रहित, ३. राग-द्वेष से रहित, ४. फलेच्छा से रहित। ऐसा कर्म करने वाला शुद्ध हो जाता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जो कर्म शास्त्रविहित है, आसक्ति रहित है, राग-द्वेष से रहित होकर किया गया है और फल की इच्छा न रखने वाले पुरुष द्वारा किया गया है – वह कर्म सात्त्विक कहलाता है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
सात्त्विक कर्म वह है जो कर्तव्यबुद्धि से, बिना किसी व्यक्तिगत स्वार्थ के किया जाए। यह कर्म योग का मार्ग है।