मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहंकारेण वा पुनः। क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्॥२४॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
12 पदयत्
which
तु
but
काम-ईप्सुना
by one desiring fruits
कर्म
action
स-अहंकारेण
with ego
वा
or
पुनः
again
क्रियते
is performed
बहुल-आयासम्
involving much effort
तत्
that
राजसम्
rajasic
उदाहृतम्
is declared.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
परन्तु जो कर्म फल की इच्छा वाले पुरुष द्वारा अथवा अहंकार सहित किया जाता है तथा बहुत परिश्रम साध्य है – वह राजस कहा गया है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
राजस कर्म में फल की इच्छा, अहंकार और अत्यधिक परिश्रम होता है। यह कर्म कर्ता को बाँधता है, क्योंकि इसमें आसक्ति और अभिमान रहता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
किन्तु जो कर्म फल की इच्छा रखने वाले पुरुष द्वारा या अहंकार सहित किया जाता है और अत्यधिक परिश्रम से युक्त होता है – वह राजस कर्म कहलाता है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
राजस कर्म में भले ही बहुत श्रम हो, पर उसमें फल की आसक्ति और अहंकार होने के कारण वह बन्धन का कारण बनता है।