श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 18 (मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga))

अध्याय 18 · श्लोक 24

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 78 2 मिनट का पठन 99 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहंकारेण वा पुनः। क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्॥२४॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
यत्
which
तु
but
काम-ईप्सुना
by one desiring fruits
कर्म
action
स-अहंकारेण
with ego
वा
or
पुनः
again
क्रियते
is performed
बहुल-आयासम्
involving much effort
तत्
that
राजसम्
rajasic
उदाहृतम्
is declared.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

परन्तु जो कर्म फल की इच्छा वाले पुरुष द्वारा अथवा अहंकार सहित किया जाता है तथा बहुत परिश्रम साध्य है – वह राजस कहा गया है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

राजस कर्म में फल की इच्छा, अहंकार और अत्यधिक परिश्रम होता है। यह कर्म कर्ता को बाँधता है, क्योंकि इसमें आसक्ति और अभिमान रहता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

किन्तु जो कर्म फल की इच्छा रखने वाले पुरुष द्वारा या अहंकार सहित किया जाता है और अत्यधिक परिश्रम से युक्त होता है – वह राजस कर्म कहलाता है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

राजस कर्म में भले ही बहुत श्रम हो, पर उसमें फल की आसक्ति और अहंकार होने के कारण वह बन्धन का कारण बनता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 18: मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga)
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सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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