श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 18 (मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga))

अध्याय 18 · श्लोक 25

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 78 2 मिनट का पठन 111 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम्। मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते॥२५॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

13 पद
अनुबन्धम्
consequence
क्षयम्
loss
हिंसाम्
injury
अनपेक्ष्य
without considering
च
and
पौरुषम्
one's own ability
मोहात्
out of delusion
आरभ्यते
is begun
कर्म
action
यत्
which
तत्
that
तामसम्
tamasic
उच्यते
is called.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सामर्थ्य को बिना विचारे केवल मोह से आरम्भ किया जाता है – वह तामस कहलाता है।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

तामस कर्म में विवेक का सर्वथा अभाव होता है। न तो परिणाम का ध्यान, न हानि का विचार, न हिंसा का भय, न अपनी क्षमता का आकलन। ऐसा कर्म अज्ञान से प्रेरित होता है।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और अपनी क्षमता का विचार किए बिना केवल मोह से आरम्भ किया जाता है – वह तामस कर्म कहलाता है।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

तामस कर्म अविवेकपूर्ण और विनाशकारी होता है। यह कर्ता और समाज दोनों के लिए हानिकारक है। इससे बचना चाहिए।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 18: मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga)
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श्लोक 25/78 32% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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