मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः। सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते॥२६॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
8 पदमुक्त-सङ्गः
freed from attachment
अनहं-वादी
without egoism
धृति-उत्साह-समन्वितः
endowed with firmness and enthusiasm
सिद्धि-असिद्ध्योः
in success and failure
निर्विकारः
unchanged
कर्ता
doer
सात्त्विकः
sattvic
उच्यते
is called.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जो कर्ता आसक्ति रहित, अहंकार रहित, धैर्य और उत्साह से युक्त तथा सफलता-असफलता में निर्विकार है – वह सात्त्विक कर्ता कहलाता है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
सात्त्विक कर्ता के लक्षण: आसक्ति-मुक्त, अहंकार-शून्य, धैर्य और उत्साह से परिपूर्ण, तथा सफलता-असफलता में समान भाव रखने वाला। ऐसा कर्ता कर्मयोगी है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जो कर्ता आसक्ति से मुक्त है, अहंकार नहीं रखता, धैर्य और उत्साह से युक्त है, तथा सफलता-असफलता में विकार रहित रहता है – वह सात्त्विक कर्ता कहलाता है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
सात्त्विक कर्ता अपने कर्म में लीन रहता है, फल की चिंता नहीं करता। वह समभाव से युक्त होता है, इसलिए वह बन्धन में नहीं बँधता।