मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः। हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः॥२७॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
9 पदरागी
attached
कर्म-फल-प्रेप्सुः
desirous of the fruits of actions
लुब्धः
greedy
हिंसात्मकः
given to injuring
अशुचिः
impure
हर्ष-शोक-अन्वितः
subject to joy and sorrow
कर्ता
doer
राजसः
rajasic
परिकीर्तितः
is declared.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
जो कर्ता रागी है, कर्मफल की इच्छा रखता है, लोभी है, हिंसक प्रवृत्ति का है, अशुचि है, तथा हर्ष-शोक से युक्त है – वह राजस कर्ता कहा गया है।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
राजस कर्ता के लक्षण: आसक्त, फलेच्छुक, लोभी, हिंसक, अशुद्ध, तथा सुख-दुःख से व्याकुल। ऐसा कर्ता अपने कर्मों के फल से बँध जाता है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
जो कर्ता रागी है, कर्मफल की इच्छा रखने वाला है, लोभी है, हिंसक प्रवृत्ति का है, अपवित्र है, तथा हर्ष-शोक से युक्त है – वह राजस कर्ता कहलाता है।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
राजस कर्ता अपनी इच्छाओं और भावनाओं के वशीभूत होता है। वह कर्म करता है, पर फल की चाह उसे बाँध लेती है।