श्रीमद्भगवद्गीता · अध्याय 18 (मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga))

अध्याय 18 · श्लोक 29

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) – मूल संस्कृत श्लोक, पदच्छेद, विस्तृत हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक व्याख्या।

कुल अध्याय श्लोक: 78 2 मिनट का पठन 108 पठन संपादकीय रूप से परीक्षित
मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु। प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय॥२९॥

पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)

12 पद
बुद्धे
of intellect
भेदम्
the distinction
धृते
of firmness
च
and
एव
also
गुणतः
according to the gunas
त्रि-विधम्
threefold
शृणु
hear
प्रोच्यमानम्
being described
अशेषेण
fully
पृथक्त्वेन
separately
धनञ्जय
O Dhananjaya.

श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)

हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)

हे धनञ्जय! बुद्धि और धृति के भी गुणों के अनुसार तीन प्रकार के भेद को सम्पूर्ण रूप से पृथक-पृथक सुनो।

दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)

अब भगवान् बुद्धि (समझने की शक्ति) और धृति (धारण करने की शक्ति) के तीन-तीन प्रकार बताने जा रहे हैं, जो सात्त्विक, राजस और तामस के रूप में विभाजित हैं।

श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse

हे धनञ्जय! अब तू बुद्धि और धृति के भी गुणों के अनुसार तीन प्रकार के भेदों को सम्पूर्ण रूप से और पृथक-पृथक मुझसे सुन।

आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message

बुद्धि और धृति भी गुणों से प्रभावित होती हैं। इनके भेद को समझकर साधक अपनी बुद्धि और धृति को सात्त्विक बनाने का प्रयास कर सकता है।

गीता जीवन संदेश (Practical Life Application)

श्रीमद्भगवद्गीता का प्रत्येक श्लोक केवल धार्मिक पाठ नहीं, अपितु जीवन के संघर्षों में सही निर्णय लेने, मन को शांत रखने और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने का शाश्वत मार्गदर्शन है।

श्रीराम शास्त्री
संपादक व शोधकर्ता

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।

अध्याय अवलोकन

अध्याय 18: मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga)
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श्लोक 29/78 37% पूर्ण
सभी १८ अध्यायों की सूची
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
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