मूल संस्कृत श्लोक (Original Sanskrit Text)
त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः। यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे॥३॥
पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word-by-Word Meanings)
13 पदत्याज्यम्
ought to be abandoned
दोषवत्
as evil
इति
thus
एके
some
कर्म
action
प्राहुः
declare
मनीषिणः
thinkers
यज्ञ-दान-तपः-कर्म
actions of sacrifice, charity, and austerity
न
not
त्याज्यम्
to be abandoned
इति
thus
च
and
अपरे
others.
श्लोक का भावार्थ (Verse Hindi Meaning)
हिंदी भावार्थ (Hindi Meaning)
कुछ विद्वान् कहते हैं कि सब कर्म दोषयुक्त होने से त्याग करने योग्य हैं, और दूसरे कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप ये कर्म त्याग करने योग्य नहीं हैं।
दार्शनिक व्याख्या एवं गूढ़ रहस्य (Commentary)
संपादक व शोधकर्ता
श्रीराम शास्त्री
वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के शोधकर्ता। सनातन इतिहास एवं गीता दर्शन पर १०+ वर्षों का अनुसंधान।
संपादकीय समीक्षा
आचार्य देवदत्त द्विवेदी
वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ एवं प्राध्यापक। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक एवं शास्त्रसम्मत सत्यापनकर्ता।
यहाँ दो मतों का उल्लेख है। एक मत कर्मों को पूर्णतया त्यागने का है, दूसरा यज्ञ, दान, तप जैसे शुभ कर्मों को न त्यागने का। यह विवाद अर्जुन की शंका का कारण है।
श्लोक का अर्थ / Meaning of the Verse
कुछ विचारक कहते हैं कि सभी कर्म दोषपूर्ण हैं, इसलिए त्याग देना चाहिए। अन्य कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप जैसे कर्म त्याज्य नहीं हैं।
आध्यात्मिक संदेश / Spiritual Message
कर्मों के त्याग में मतभेद है, पर गीता आगे स्पष्ट करेगी कि सात्त्विक त्याग क्या है। हमें शास्त्र के निर्णय को समझना चाहिए।